हिंदी कक्षा के व्यंगात्मक वाक़ये
तो मुद्दा ये है की हमारी पाठशाला में शिक्षकों को रचनात्मकता और नवाचार भाता न था | बात है हिंदी परीक्षा की जिसमे प्रश्न आते थे वही घिसे पिटे स्त्रीलिंग से पुल्लिंग और विपरीत | तो एक महानुभाव को जब भगवान का लिंग बदलना था (तिरस्कारी और असंभव काम है जानता हूँ) तो महाशय का जवाब रहा मादा भगवान | शिक्षिका ने उस छात्र को महात्मा के खिताब से तो नवाजा पर अंक न दिए |
दूसरा वाक़या भी हिंदी कक्षा का ही है, दूसरे किस्म के घिसे पिटे सवाल आते थे दिए गए एक शब्द पे वाक्य बनाने के | अब कई ऐसे क्लिष्ट शब्द आते थे की बच्चों के हाथों से तोते उड़ जाते | मसलन एक शब्द आया विहंगम | अब विहंगम किस चिडिया का नाम है इसकी तो आधे से ज्यादा लोगों को हवा भी न थी | फिर क्या लोगों का रचनात्मकता दिमाग चल गया | एक राम बाण वाक्य निकाला गया जो सब दुःख दूर कर दे | भाई किसी भी संज्ञा का लिंग बदलने के लिए वह संज्ञा नर है की मादा इतना तो पता ही होना चाहिए पर ऐसी कोई भी बाधा इस राम बाण वाक्य में न थी | और वह महान वाक्य था "विहंगम एक अच्छा शब्द है" | कुछ छात्र तो यहाँ तक न रुके उन्होंने सवाल को ही जवाब बना डाला और स्याह अक्षरों में लिखा "शिक्षिका ने विहंगम पे वाक्य लिखने को कहा" | इस वाक्य ने तो शिक्षिका को अवाक कर दिया | अब इस बात को झुठलाया तो नहीं जा सकता की शिक्षिका ने वाक्य लिखने को कहा है, ये तो अटूट सत्य है और इस वाक्य में आवश्यक शब्द भी है तो वह शिष्य को पुरस्कार में भारत की खोज शून्य तो भेंट दे नहीं सकी हाँ कक्षा में निवेदन जरूर किया की ऐसे वाक्य लिखिए जिनसे शब्द का अर्थ उभर के आये और मन मसोस कर आधे अंक दिए|