babri masjid kaand
आज इस बात को १५ साल हो गए हैं. क्यूंकि ये मुद्दा लोगों के जेहन मैं फीका पड़ चूका है इसलिए हमारे नेता ( जो दरअसल प्रेता हैं ) कुछ नही कह रहे हैं सिवाय लोकतंत्र का चक्का जाम करने के। ये टोकरी मैं पड़े उन केक्डों कि तरह हैं जो न तो खुद बाहर निकालेंगे न ही किसी और को निकलने देंगे ।
उस समय जब ये बवाल हुआ था मैं काफी छोटा था । हालांकि गुजरात के दंगों के बारे मैं कहा जाता है कि टी वी पर समाचार द्वारा व्यर्थ मैं प्रचार हुआ पर मुझे अछे से याद है इस काण्ड मैं मस्जिद के ढहाने की विडियो कैसेट हर घर में देखे गए थे । इन तस्वीरों मैं से एक तस्वीर मेरे जेहन मैं घर कर गयी, वो ठी दिखने मैं कमज़ोर एक बुजुर्ग आदमी कि जो भीड़ से कहीं आगे आकर पुलिस कि लाठी चार्ज के सामने सीना ताने दौड़ने लगा और पास मैं पड़ा एक बड़ा सा ईट उठा के फेंका । उसके चेहरे मैं एक गज़ब का आक्रोश और पीड़ा नज़र आ रही थी । धर्म के नाम पर आदमी क्या नही कर सकता ये मैंने उस आदमी कि आँखों मैं देखा था ।
हमारी कानून व्यवस्था और पुलिस कि जांच प्रणाली के बारे मैं क्या कहा जा सकता है जब १२ साले बाद आरोपी को न्यायालय मैं लाया जाता है और १५ साल बाद एक साक्षी मिलता है ! जब कुछ ऐसा पड़ता या सुनता हूँ तो फ्रान्ज़ काफ्का कि लिखी ये कहानी 'before the law' याद आती है। आशा करता हूँ इस जन्म में इस मुक़दमे का नतीजा देख सकूं ।