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Monday, December 14, 2009

कहानी दो कुक्कुर की

भाई जो भी कहो ज्युरिख्पुर और ज्युरिख्पुर के कुक्कुर का हमारा कुछ तो नाता है | जहां public place में बच्चों और कुत्तों की आवाज नहीं सुने देती वहाँ एक ही हफ्ते में दो मजेदार वाकये हो गए | पहले तो एक सवा किलो के कुत्ते ने हमपे भौंका | कुत्ता भी ऐसा पिद्दी सा की छींके तो खुद को दस्त लग जाये | हमारी जर्मन कक्षा जर्मन लोगों से बात करना तो सिखा रही है पर कुत्तों के बारे में अवगत न कराया | अब हम कुक्कुर महाशय को हिंदी या अंग्रेजी में दुत्कारें और उसे समझ में ही न आये तो क्या फायदा !

खैर दूसरी घटना ये हुई की भरी दुपहरिया बीच बजरिया हमने एक औरत को अपने कुत्ते की गन्दगी उठाते हुए देखा | कुक्कुर महाशय ने तो जहां मन आया कर डाला अब बेचारी मालकिन को साफ़ करना पड़ा, समझ में न आया मालिक कौन है दोनों में | हमें लगा की किये कराये पे पानी फेर देंगी मैडम पर कुक्कुर-मल उठाने के भी special दस्ताने आते हैं | और मैडम भी मेधावी थी, अब इतना बड़ा कुत्ता पाला है तो एक दस्ताने से क्या होगा , अब हम इंडिया टीवी \ आज तक तो हैं नहीं की आपको आँखों देखा और कैमरा कैद विवरण दे दें | पर हाँ ये आश्वासन देते हैं की कैमरा होगा भी तो हम अपने पाठकगण को ऐसी वीभत्स छवियों से त्रस्त न करेंगे

Wednesday, October 21, 2009

नाटकीय रूपांतरण

बहुत कम ऐसा होता है जब आपके कॉलेज के अनुभव आपको पाठशाला की याद दिलाये | जिस lecture में मैं फिलहाल बैठा हुआ हूँ वो शिक्षिका पड़ा तो रही है innovation के बारे में किन्तु पड़ रही हैं एक पहले से लिखे मूलपाठ द्वारा किसी नाटक के अभिनय माफिक| यह देख कर अपने पुराने रसायन शास्त्र (chemistry) के शिक्षक की याद आ गयी जो एक guide book से पढाया करते थे | बच्चों को पता न चल जाये तो सन सत्तर के किसी अख़बार का cover लगा के आते थे | पर आप तो जानते हैं, बच्चा भगवान् का रूप होता हैं और इतने सारे भगवानों से कहाँ कुछ छुप सकता है, एक चतुर बालक ने सारी किताबे छान मारी और वो किताब खरीद कर क्लास के एक कोने में बैठ जाता| बस फिर क्या शिक्षक महाराज दनादन, line by line किताब से पढाते रहते और लड़का line by line underline करता रहता :D

Sunday, August 16, 2009

सोफिया का स्वयंवर

तो बात ये है की हमारे पड़ोस में एक आंटी जी हैं जिन्होंने guinea pig और खरगोश पाल रखे हैं जो बाग़ में खूब अठ्खेलियां करते हैं | खरगोश थोड़ा नई है तो guinea pig उसका तिरस्कार करके भगा देते हैं, तो अब उस अकेली बेचारी मायूस खरगोश के लिए एक जीवन साथी ढूँढा जा रहा है, जीवनसाथी डाट काम पे क्या इंसान छोड़ा और जानवरों का भी मेल होता है? होता हैं तो वहाँ तो देखा ही जाएगा पर पाठकों से निवेदन है की उनकी नज़र में कोई सुंदर, सुशील, अच्छी कद काठी वाला झबरीला बांका नर खरगोश हो तो एक ठो फोटू (और bio data) सहित हमे contact करें|

आपके लिए सोफिया की फोटू हाजिर है



अंकल जी की कितनी सेवा करती हैं ये तो पता नही पर खरगोश के दिल की धड़कनें तो आंटी को दूर दूर तक सुनाई दे जाती है, उसकी वो सूनी विरह की वेदना से लिप्त आँखें बर्दाश्त के बाहर है| जब उनके रख रखाव और साफ़ सफाई के बारे में पूछा गया तो पता चला मादा खरगोश तो बहुत साफ़ रहती है, guinea pig भी वैसे तो साफ़ ही रहते हैं पर कभी कभार आंटी को उनके पिछवाडे पानी से धोने पड़ते हैं! क्या विडम्बना है आदमी अपने पिछवाडे तो सादे कागज़ से पोंछता है और अति प्रीय guniea pig को मिलता है सिर्फ़ पानी! खैर राखी को तो उसका जीवन साथी मिल ही गया है देखते हैं बेचारी मादा खरगोश को उसका मन चाहा वर मिलेगा की नही

Update:
पाठकों को ये बताते हुए बड़ी खुशी हो रही है की सोफिया का जीवन साथी ढूँढ लिया गया है, गोरा चिट्टा सा एक handsome नर खरगोश जिसकी आँखें नीली नीली हैं और नाम है सिम्बा, विडम्बना का कोई अंत नही खरगोश का नाम सिम्बा! सोफिया और सिम्बा दोनों आधुनिक ख्यालों के हैं तो पाठक अभी शादी की आस न बाधें अभी उन्हें एक दूसरे के बारे में जानना है, शादी तो होती रहेगी

Monday, May 25, 2009

मानोगे नहीं ...

भौतिकी (physics) एक ऐसा विषय है जो हमे हमेशा से भाता रहा है | क्या आपने शाखा से गिरे सेब से विज्ञानं की नयी शाखा निकलते देखी है?! भौतिकी के दाहिने हाथ के खेल का किस्सा तो हम सुना चुके हैं, और हिंदी भाषा वाला भी | यह किस्सा कुछ और है | बात है CBSE board के इम्तिहान की जिसका कुरुक्षेत्र शहर से थोडा दूर था तो हम सब छात्र एक ही बस में जाते और आते थे | कुछ हम थे जो समीकरणों (equations) और सूत्रों (formulas) में सर फुडाते रह गए और कुछ वो थे जिन्होंने भौतिकी को भगवान् से मिला डाला ! नहीं नहीं हम श्रीमान भूरे (dan brown) के सहपाठी नहीं रहे | da vinci छोडिये ये तो angel, demon के बाप तक पहुँच गए |

इन महानुभाव का एक जुमला हुआ करता था "भाई .... तुम मानोगे नहीं ....." (अरे बंधू जब तुम्हे पता है की हम नहीं मानने वाले हैं तो बता काहे रहे हो! खैर ये बात तो किसी और मुद्दे की है...) | तो भौतिकी की परीक्षा ख़तम हुई और छात्रों का काफिला सवालों और उनके जवाबों में उलझा, मध्हम कदमों से आगे बढ ही रहा था की किसी ने उन महानुभाव से पूछ ही लिया "यार कैसी हुई तुम्हारी परीक्षा" बस फिर क्या था उन्होंने वह महान शब्द कह डाले "की आज तो यदि ब्रम्हा जी भी नीचे उतर के बोल दे की बेटा तुम पास हो गए हो तो में कहूँगा..... आप झूठ बोल रहे हैं"!

(अपने ही बनाए माटी के पुतले के इतने अटूट विश्वास को परमपिता ब्रम्हा भी कैसे झुठला सकते थे तो ....)